काव्य सदैव से ही मानव के अंतर्मन से उमड़ने वाले भावों, संवेदनाओं और व्यथा को प्रकट करने , समझने का एक अनुपम माध्यम रहा है।काव्य की व्यापकता हर्ष में, विषाद में, प्रेम में, मिलन और बिछोह में, मित्रता और शत्रुता में, विस्तृत है। सभी प्रकार के मनभावों में काव्य प्रस्फुटित होकर हृदय को आलोकित कर देता है। इन उदगारों का हाथ थामकर जो कुछ भी कलम, कागज से मिलकर सृजित करती है उसे साझा करने का एक प्रयास है: अंतर्मन की कविता काव्य संग्रह।। "काव्याँश"
बुधवार, 6 जुलाई 2022
यूं ही उलझा रहे ये मन ...May this mind just keep getting confused..
यूं ही उलझा रहे ये मन , यही जीवन की सुलझन है।
May this mind just keep getting confused,
सोमवार, 27 जून 2022
पलकों पर सजे सपना .....a dream adorned on the eyelids.
तुझे ऐ जिंदगी हमने, खुली बाहों से अपनाया।
तेरे हर सितम को भी, सर आंखों पे बिठलाया।।
जहां रोने का जी करता ,वहां भी मुस्कुराए हम।
अंधेरों ने जिसे छोड़ा, बने उसके भी साए हम ।।
हमने राह भूली हैं, मंजिलों से नही शिकवा ।
हर मील के पत्थर का, झुक कर ही किया सजदा।।
गुज़ारिश है यही तुझसे ,रहे अंदाज ये अपना।
हकीकत जो हो जैसी हो ,पलकों पर सजे सपना।।
"
काव्याँश"
We adopted you, O life, with open arms.
Your every injustice too, we respected and honoured.
Wherever we have to cry, we smile there too.
We became the shadow of the one whom the darkness left.
We have forgotten the path, did not complain the destinations.
Every milestone was bowed down and prostrated.
This is the request to you,
Whatever the reality is, a dream adorned on the eyelids.
बुधवार, 22 जून 2022
चांद... the moon
हँसने को यहां खुशियां समझते हैं ज़माने में ..
जिसे आंसू नहीं हासिल उसे क्या मुस्कुराने में
..
कभी एक रात भर तू देख इस चंदा की फितरत को..
चलता है अंधेरे में चमक देता है कुदरत को..
"काव्याँश"
Laughing is considered to be happiness here in the time..
What's in smiling to the one who doesn't get tears?
Sometimes, you see the nature of this moon for an entire night..
It walks in the dark, gives glow to the nature, and makes it bright.
रविवार, 1 मई 2022
हज़ारों फूल बिना मौसम के ही खिलने लगे..thousands of flowers started blooming
हज़ारों फूल बिना मौसम के ही खिलने लगे,
बुधवार, 6 अप्रैल 2022
ये राही मन...My traveler heart
ये राही मन फिर से मेरा ,
उन गलियों में जाना चाहे ।
जिन गलियों में चलना सीखा ,
उन में फिर खो जाना चाहे ।
ये पग मेरे फिर से ढूंढे ,
उन राहो के पत्थर को ,
जिन पर ठोकर खाकर सम्भला।
सीखा ऊँचा करना सर को ।।
इन नैनो को उन मीतों से ,
फिर मिलने की अभिलाषा,
जिन मीतों से इन्हे मिलाकर ।
सीखी दिल ने प्रेम की भाषा ।।
तोड़ बिखेरे जिन लम्हों ने ,
मन के कोमल जज्बातों को ,
मैं फिर से अब उन्हें पुकारू,
उन दिवसों उन रातों को ।
ये कर मेरे फिर से मचलें ,
छूने को उन फूलों को ।
आहत करने में जिन फूलों ने ,
पीछे छोड़ा शूलों को ।।
उपकार ह्रदय पर उनका भी है ,
छद्म रूप धर जिन मित्रों से ,
मनोभाव छल छलनी मेरा ,
हृदय हुआ जिन कतरों से...
"काव्याँश"
My traveler heart once again,
Would like to go to those streets.
The streets I learned to walk
Want to be lost in them once again.
my steps once again, searching
to those path stones,
I stumbled upon and
Learned to raise my head high.
these eyes desire to see those beloved,
longing to meet them once again,
Heart learned the language of love from them.
The moments that broke,
soft feelings of heart,
I will call them again now,
To those days and nights,
Made me cry again and again..
these palms wish to touch those flowers.
The flowers that hurt, more than thorns.
Leaving the prongs behind.
their gratitude is also on the heart,
friends who disguised themselves, became apart.
kavita...कविता
हार जीत परिणाम समर का नही वीरता का पैमाना निश्छल जिसने युद्ध लड़ा नियति ने सत्यवीर उसे माना मेरी पलकों और नींदों का रहा हमेशा ब...
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हार जीत परिणाम समर का नही वीरता का पैमाना निश्छल जिसने युद्ध लड़ा नियति ने सत्यवीर उसे माना मेरी पलकों और नींदों का रहा हमेशा ब...
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महल रेतों के बनते थे हमारी भी हथेली से कभी ऐसा हुनर भी था हाथों की लकीरों में... "काव्याँश" Palaces used to be made of sand, eve...
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रात की बाहों में भटके, चांद अपनी नींद ढूंढे। याचक बनी प्यासी धरा, मेघों में शीतल बूंद ढूंढे। पुष्प ढूंढे एक भ्रमर जो, प्रेम का निश्छल पुजारी...


